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व्रत कथाएँ

हिंदू धर्म के प्रसिद्ध व्रतों की पौराणिक कथाएँ — सत्यनारायण, करवा चौथ, अहोई अष्टमी, संकष्टी चतुर्थी।

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व्रत कथा क्या है?

व्रत के दिन सम्बन्धित देवता की कथा सुनना अत्यंत आवश्यक माना गया है। शास्त्रों में कहा गया है — "कथा-श्रवण के बिना व्रत अधूरा रहता है।" कथा सुनने से व्रत-धारक को व्रत के महत्व, इतिहास, और फल का ज्ञान होता है। साथ ही कथा-श्रवण से मन एकाग्र होता है और व्रत का पुण्य कई गुना बढ़ जाता है।

१. सत्यनारायण व्रत कथा

व्रत: पूर्णिमा के दिन या कोई शुभ अवसर — गृह-प्रवेश, विवाह, संतान-प्राप्ति आदि।

कथा का सार: स्कन्द पुराण में सत्यनारायण व्रत की पाँच कथाएँ हैं —

पहली कथा: एक बार महर्षि नारद ने भगवान विष्णु से पूछा — "प्रभु! कलियुग में मनुष्य के दु:खों का अंत कैसे हो?" भगवान विष्णु ने उन्हें "सत्यनारायण व्रत" बताया।

दूसरी कथा: काशी में एक गरीब ब्राह्मण रहता था। एक दिन उसे एक वृद्ध-ब्राह्मण ने सत्यनारायण व्रत का विधान बताया। ब्राह्मण ने व्रत किया और उसे धन-धान्य की प्राप्ति हुई।

तीसरी कथा: एक लकड़हारा प्रतिदिन लकड़ी बेचकर गुजारा करता था। उसने यह व्रत किया और उसे राज-सेवा प्राप्त हुई।

चौथी कथा: साधु वैश्य नामक व्यापारी ने व्रत न करने पर समुद्र में कष्ट उठाए। बाद में व्रत करने पर सब बाधाएं दूर हुईं।

पाँचवी कथा: राजा तुंगध्वज ने व्रत के प्रसाद का अनादर किया तो उसका सम्पूर्ण राज्य नष्ट हो गया। बाद में पश्चाताप कर व्रत-प्रसाद ग्रहण करने पर सब वापस मिला।

शिक्षा: सत्य का पालन, श्रद्धा से व्रत, प्रसाद का सम्मान — यह तीनों जीवन में समृद्धि लाते हैं।

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२. करवा चौथ व्रत कथा

व्रत: कार्तिक कृष्ण चतुर्थी — सुहागन स्त्रियों द्वारा पति की दीर्घायु हेतु निर्जल व्रत।

कथा: प्राचीन काल में सात भाइयों की एक प्रिय बहन थी जिसका नाम वीरावती था। उसने पहली बार करवा चौथ का व्रत रखा। दिन-भर भूखी-प्यासी रहने से उसकी हालत बिगड़ गई।

भाइयों ने बहन का दुःख देखकर एक चाल चली। उन्होंने पीपल के वृक्ष पर एक दीपक जलाकर रख दिया और बहन से कहा — "देख, चाँद निकल आया है। अब तू अर्घ्य देकर अन्न ग्रहण कर ले।" बहन ने भाइयों के झूठे चाँद को असली समझकर अर्घ्य दिया और भोजन कर लिया।

परंतु जैसे ही उसने पहला कौर मुँह में रखा, उसे समाचार मिला कि उसका पति मर गया है। दु:ख से वह विलाप करने लगी। तब इंद्राणी (इंद्र की पत्नी) प्रकट हुईं और बोलीं — "तूने व्रत-नियम तोड़ा है। अब विधिवत व्रत कर — पति की पुनः-प्राप्ति होगी।"

वीरावती ने १२ महीनों तक हर चतुर्थी पर पूर्ण व्रत किया। १३वीं चतुर्थी (करवा चौथ) पर इंद्राणी प्रसन्न हुईं और उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया।

शिक्षा: श्रद्धा, समर्पण, और नियम-पालन से असंभव भी संभव हो जाता है।

३. अहोई अष्टमी व्रत कथा

व्रत: कार्तिक कृष्ण अष्टमी — माताओं द्वारा संतान की दीर्घायु एवं सुख हेतु।

कथा: एक साहूकार के सात पुत्र, सात बहुएं और एक पुत्री थी। एक बार दिवाली से कुछ दिन पहले बहुएं और बेटी मिट्टी लेने जंगल गईं। बेटी ने मिट्टी खोदते समय गलती से एक स्याहु (साही) के सात बच्चों को मार दिया।

स्याहु ने श्राप दिया — "तुम्हारी कोख भी ऐसे ही सूखी रहेगी।" बेटी और बहुओं ने अपनी सास से प्रार्थना की कि वे यह श्राप अपने ऊपर ले लें — क्योंकि वे माँ हैं और प्रत्येक मातृत्व का दु:ख समझती हैं।

सास ने श्राप अपने ऊपर ले लिया। समय बीतने पर उसके सातों पुत्रों और एक-एक करके सात बहुओं की कोख भी सूख गई।

एक दिन एक वृद्धा ने सास को बताया — "तू कार्तिक कृष्ण अष्टमी को 'अहोई माता' का व्रत रख। दीवाल पर अहोई और स्याहु तथा सात बच्चों का चित्र बनाकर पूजा कर।" साहूकारिन ने व्रत किया, अहोई माता प्रसन्न हुईं, और सब बहुओं को संतान-सुख प्राप्त हुआ।

शिक्षा: मातृत्व का त्याग सर्वोपरि है। सच्ची भक्ति और प्रायश्चित से सबसे बड़ा श्राप भी कट जाता है।

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४. संकष्टी चतुर्थी (गणेश चतुर्थी) व्रत कथा

व्रत: प्रत्येक मास की कृष्ण चतुर्थी — विघ्न-निवारण एवं सिद्धि-प्राप्ति हेतु।

कथा: एक बार माता पार्वती और भगवान शिव चौसर खेल रहे थे। बीच में निर्णय करने के लिए उन्होंने एक छोटा बालक चुना। बालक ने जल्दबाजी में निर्णय गलत दे दिया।

पार्वती जी क्रोधित हो गईं और बालक को कीचड़ में फंसने का श्राप दे दिया। बालक रोने लगा।

तब पार्वती जी ने कहा — "गणेश चतुर्थी का व्रत कर। मेरे पुत्र गणेश तुझे क्षमा कर देंगे।"

बालक ने व्रत किया। गणेश जी प्रसन्न हुए और बालक को कीचड़ से मुक्त कर दिया। तब से ही चतुर्थी का व्रत विघ्न-निवारण के लिए प्रसिद्ध हो गया।

शिक्षा: गलती हो जाए तो श्रद्धा से क्षमा मांगने पर भगवान अवश्य मुक्त करते हैं।

व्रत-कथा सुनने की विधि

१. व्रत के दिन शुद्ध वस्त्र पहनकर बैठें।

२. चौकी पर देवता का चित्र/प्रतिमा स्थापित करें।

३. कलश-स्थापना, धूप-दीप, अक्षत-पुष्प अर्पण करें।

४. कथा को शांत मन से सुनें — स्वयं पढ़ें या किसी अन्य से पढ़वाएं।

५. कथा के बीच में बात-चीत न करें।

६. कथा-समाप्ति पर "जय (देवता का नाम)" का जयकार करें।

७. आरती करें, प्रसाद बाँटें।

८. भोजन/पारणा सूर्योदय/चंद्रोदय/पूजा-समाप्ति के बाद करें (व्रत-नियमानुसार)।