पंचांग लोड हो रहा है...
असतो मा सद्गमय · तमसो मा ज्योतिर्गमय · मृत्योर्मा अमृतं गमय

होली

रंगों का त्योहार — फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाने वाला उल्लास और प्रेम का पर्व

विज्ञापन स्थान (728×90)

पौराणिक कथा — प्रह्लाद और होलिका

प्राचीन काल में हिरण्यकश्यप नामक एक अहंकारी राक्षस-राजा था। वह स्वयं को भगवान मानता था और चाहता था कि सब उसकी पूजा करें। परंतु उसका पुत्र प्रह्लाद अनन्य विष्णु-भक्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास किए — पहाड़ से गिराया, हाथी से कुचलवाया, समुद्र में डुबाया — परंतु भगवान विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया।

अंत में हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका, जिसे अग्नि में न जलने का वरदान था, को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठे। परंतु हुआ इसके विपरीत — होलिका जल गई और प्रह्लाद सुरक्षित बच गया। यही "होलिका दहन" का स्मरण है — असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक।

अगले दिन भगवान विष्णु ने नृसिंह अवतार लेकर हिरण्यकश्यप का वध किया, और सम्पूर्ण नगर ने रंग-गुलाल उड़ाकर अधर्म के अंत और भक्ति की विजय का उत्सव मनाया।

राधा-कृष्ण की होली

होली को कृष्ण-लीला से भी जोड़ा जाता है। कथा है कि कृष्ण ने माता यशोदा से शिकायत की कि "राधा गोरी क्यों है, और मैं श्याम क्यों?" यशोदा ने हँसकर सुझाया — "कृष्ण, तू ही जाकर राधा को रंग लगा दे।" तब से ही ब्रज-वृंदावन में होली रंग-उत्सव बन गई। बरसाने की लठमार होली, मथुरा-वृंदावन की फूलों की होली, और बनारस की मसान की होली आज भी विश्व-प्रसिद्ध हैं।

विज्ञापन स्थान (300×250)

होली कैसे मनाएं?

होलिका दहन (छोटी होली): फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को मुहल्ले/समाज में लकड़ी, उपले, धूप-समिधा से होलिका जलाई जाती है। उसके सात फेरे लगाते हुए नई फसल की बालियाँ अर्पित की जाती हैं। यह बुराइयों को जलाकर शुद्ध होने का प्रतीक है।

रंग वाली होली (धुलेंडी): अगले दिन प्रातः से ही गुलाल और रंगों से होली खेली जाती है। मित्र-परिवार-पड़ोसी मिलकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं, गुजिया-मठरी खाते हैं, ठंडाई पीते हैं, और पुरानी कटुताओं को भुलाकर नए सिरे से रिश्ते बनाते हैं।

भजन

होली खेलें रघुवीरा

श्री राम और माता सीता की होली का प्रसिद्ध भजन
होली खेलें रघुवीरा YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
सुनें
होली खेलें रघुवीरा अवध में होली खेलें रघुवीरा ।
केसर रंग घोल खेलें श्याम-गोरा ।
होली खेलें रघुवीरा ॥
लाल गुलाल मलें श्री राम चंद्र को ।
श्याम बने अवध बिहारी ॥
हिल-मिल खेलें राम लखन भैया ।
हाथ में पिचकारी प्यारी ॥
इस लोकप्रिय होली-भजन में अवधपुरी की होली का सुंदर वर्णन है। श्री राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और सीता जी मिलकर केसर-गुलाल से होली खेलते हैं। केसरिया रंग लगने से गोरे राम भी श्याम-वर्ण लगने लगते हैं — यह कृष्ण-स्वरूप का संकेत भी है। यह भजन भक्ति, परिवार-प्रेम और आनंद का सुंदर समन्वय है।

सावधानियाँ

• केवल हर्बल/जैविक रंगों का प्रयोग करें — रासायनिक रंग त्वचा-नेत्रों को हानि पहुँचा सकते हैं
• जल का दुरुपयोग न करें — पर्यावरण की रक्षा करें
• किसी पर बलपूर्वक रंग न डालें
• पशुओं और बच्चों पर रंग न डालें
• होली के नशे/मादक पदार्थों से दूर रहें
• भांग-ठंडाई का सेवन सीमित मात्रा में ही करें