आरती
जय गणेश जय गणेश देवा
श्री गणेश जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध आरती
जय गणेश जय गणेश देवा
YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
सुनें
पूर्ण पाठ
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी ।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी ॥
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा ॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया ।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी ।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी ॥
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा ॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया ।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥
अर्थ एवं भावार्थ
इस आरती में श्री गणेश जी की महिमा गाई गई है। एकदंत, चार भुजाओं वाले, माथे पर तिलक, मूषक की सवारी पर विराजमान — गणपति देव अंधों को आँख, कोढ़ियों को स्वस्थ काया, निःसंतानों को पुत्र, और निर्धनों को धन देते हैं। पार्वती-शिव के पुत्र इस विघ्नहर्ता की सभी कामनाएं पूर्ण करने वाली कृपा-दृष्टि सबपर हो।