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असतो मा सद्गमय · तमसो मा ज्योतिर्गमय · मृत्योर्मा अमृतं गमय

श्री गणेश

विघ्नहर्ता गणपति — सभी देवताओं में प्रथम पूज्य, बुद्धि के दाता, सिद्धि-विनायक

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आरती

जय गणेश जय गणेश देवा

श्री गणेश जी की सर्वाधिक प्रसिद्ध आरती
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जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी ।
माथे पर तिलक सोहे, मूसे की सवारी ॥
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे, सन्त करें सेवा ॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया ।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
सूर श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
दीनन की लाज रखो, शम्भु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो, जग बलिहारी ॥
इस आरती में श्री गणेश जी की महिमा गाई गई है। एकदंत, चार भुजाओं वाले, माथे पर तिलक, मूषक की सवारी पर विराजमान — गणपति देव अंधों को आँख, कोढ़ियों को स्वस्थ काया, निःसंतानों को पुत्र, और निर्धनों को धन देते हैं। पार्वती-शिव के पुत्र इस विघ्नहर्ता की सभी कामनाएं पूर्ण करने वाली कृपा-दृष्टि सबपर हो।
मंत्र

वक्रतुण्ड महाकाय मंत्र

श्री गणेश का प्रसिद्ध आवाहन-श्लोक
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वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

ॐ गं गणपतये नमः ॥
ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
हे टेढ़ी सूँड वाले, विशालकाय, करोड़ सूर्यों के समान तेजस्वी श्री गणेश! मेरे सभी कार्यों में सदैव विघ्नों का नाश कीजिए। यह श्लोक प्रत्येक शुभ कार्य के आरंभ में पढ़ा जाता है। "ॐ गं गणपतये नमः" गणेश जी का बीज मंत्र है — इसके १०८ बार जाप से बुद्धि, सिद्धि और निर्विघ्न कार्य-सिद्धि प्राप्त होती है।
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स्तोत्र

संकटनाशन गणेश स्तोत्र

नारद पुराण से — बारह नामों का प्रसिद्ध स्तोत्र
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नारद उवाच —
प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥१॥
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥२॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥३॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥४॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥५॥
इस संकटनाशन स्तोत्र में देवर्षि नारद ने श्री गणेश के बारह नामों का वर्णन किया है — वक्रतुण्ड, एकदन्त, कृष्णपिङ्गाक्ष, गजवक्त्र, लम्बोदर, विकट, विघ्नराज, धूम्रवर्ण, भालचन्द्र, विनायक, गणपति, गजानन। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल — तीनों समय इन बारह नामों का पाठ करता है, उसके सब विघ्न नष्ट हो जाते हैं और सब कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है। आयु, धन, कीर्ति की वृद्धि होती है।
भजन

देवा हो देवा गणपति देवा

सबसे लोकप्रिय गणेश भक्ति-भजन
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देवा हो देवा गणपति देवा,
तुमसे बढ़कर कौन ।
गोरी का लाल कहाएँ,
भूलूँ माता-बाप का नाम ।
देवा हो देवा गणपति देवा,
तुमसे बढ़कर कौन ॥

चार भुजाएं तेरी प्यारी,
सिर पे है मुकुट सुहाना ।
मूषक की तू करे सवारी,
सबसे न्यारा है तेरा घराना ॥

ले के मोदक थाल सजाऊँ,
करूँ तेरी आरती ।
पाँव छुऊँ माथा झुकाऊँ,
पूरी हो मनोरथ-गति ॥
यह आधुनिक भक्ति-भजन गणपति बप्पा की महिमा का सरल और मधुर वर्णन है। चार भुजाओं वाले, मुकुट-धारी, मूषक-वाहन गणेश को मोदक का भोग और श्रद्धा-पूर्ण आरती से प्रसन्न किया जाता है। यह भजन हर पूजा-अनुष्ठान के लिए आदर्श है, विशेष रूप से गणेशोत्सव में।
अष्टक

श्री गणेशाष्टकम्

आठ श्लोकों का प्रसिद्ध स्तोत्र — अदि शंकराचार्य द्वारा
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एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम् ।
लम्बोदरं विशालाक्षं वन्देऽहं गणनायकम् ॥१॥
मौञ्जीकृष्णाजिनधरं नागयज्ञोपवीतिनम् ।
बालेन्दुशकलं मौलौ वन्देऽहं गणनायकम् ॥२॥
चित्ररत्नविचित्राङ्गं चित्रमालाविभूषितम् ।
कामरूपधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥३॥
गजवक्त्रं सुरश्रेष्ठं कर्णचामरभूषितम् ।
पाशाङ्कुशधरं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥४॥
मूषिकोत्तममारुह्य देवासुरमहाहवे ।
योद्धुकामं महावीर्यं वन्देऽहं गणनायकम् ॥५॥
यक्षकिन्नरगन्धर्वसिद्धविद्याधरैः सदा ।
स्तूयमानं महाबाहुं वन्देऽहं गणनायकम् ॥६॥
श्री गणेशाष्टकम् में आदि शंकराचार्य ने आठ श्लोकों में गणेश जी का अद्भुत वर्णन किया है — एकदन्त, महाकाय, तप्त-काञ्चन के समान देहकान्ति, लम्बा उदर, विशाल नेत्र, मौंजी और कृष्ण-मृगचर्म धारण, सर्प-यज्ञोपवीत, मस्तक पर बाल-चन्द्र, गज-मुख, कानों पर चामर, हाथों में पाश-अंकुश, मूषक पर सवार। यक्ष-किन्नर-गन्धर्व-सिद्ध-विद्याधर सब इनकी स्तुति करते हैं। नियमित पाठ से समस्त बाधाएँ दूर होती हैं।
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चालीसा

श्री गणेश चालीसा

चालीस चौपाइयों का स्तुति-स्तोत्र
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॥ दोहा ॥
जय गणपति सद्गुण सदन, कविवर बदन कृपाल ।
विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल ॥

॥ चौपाई ॥
जय जय जय गणपति गणराजू । मंगल भरण करण शुभ काजू ॥
जय गजबदन सदन सुखदाता । विश्व विनायक बुद्धि विधाता ॥
वक्रतुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन । तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन ॥
राजत मणि मुक्तन उर माला । स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला ॥
पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं । मोदक भोग सुगन्धित फूलं ॥
सुन्दर पीताम्बर तन साजित । चरण पादुका मुनि मन राजित ॥
धनि शिव सुवन षडानन भ्राता । गौरी ललन विश्व-विख्याता ॥
ऋद्धि-सिद्धि तव चँवर सुधारे । मूषक वाहन सोहत द्वारे ॥
कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी । अति शुचि पावन मंगल कारी ॥
एक समय गिरिराज कुमारी । पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी ॥
भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा । तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा ॥
अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा । मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा ॥
मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला । बिना गर्भ धारण यहि काला ॥
गणनायक गुणज्ञान निधाना । पूजित प्रथम रूप भगवाना ॥
अस कहि अन्तर्ध्यान रूप ह्वै । पलना पर बालक स्वरूप ह्वै ॥
बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना । लखि मुख सुख नहिं गौरी समाना ॥
सकल मगन सुख-मंगल गावहिं । नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं ॥
शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं । सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं ॥
लखि अति आनन्द मंगल साजा । देखन भी आये शनि राजा ॥
निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं । बालक देखन चाहत नाहीं ॥
गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो । उत्सव मोर न शनि तुहि भायो ॥
श्री गणेश चालीसा में चालीस चौपाइयों के द्वारा गणपति जी की महिमा, जन्म-कथा, स्वरूप, और कृपा का वर्णन किया गया है। एकदन्त, चार भुजा, मूषक-वाहन, मोदक-प्रिय, ऋद्धि-सिद्धि सहित विराजमान विश्व-विनायक की यह स्तुति प्रत्येक शुभ कार्य के पूर्व पाठ करने योग्य है। पूर्ण चालीसा का नियमित पाठ करने से बुद्धि-वृद्धि, विघ्न-नाश, सिद्धि-प्राप्ति होती है।

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