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असतो मा सद्गमय · तमसो मा ज्योतिर्गमय · मृत्योर्मा अमृतं गमय

शनि देव

न्यायाधीश — कर्म-फल के दाता, धर्म के रक्षक

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शनि देव का स्वरूप एवं महत्व

शनि देव सूर्य देव और देवी छाया (संज्ञा) के पुत्र हैं — यमराज के सहोदर। नवग्रहों में सबसे धीमी गति से चलने वाले शनि — एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहते हैं। यही "साढ़े साती" का कारण है — जब शनि किसी राशि से होकर गुजरते हैं, तो लगभग ७.५ वर्ष का प्रभाव देते हैं।

शास्त्रों में शनि को "दण्डाधिकारी" और "कर्म-फल-दाता" कहा गया है। वे न्यायप्रिय हैं — जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है। यदि कोई शनि से डरता है, तो वास्तव में वह अपने पापकर्मों से डर रहा है। सच्चे और धर्मनिष्ठ व्यक्ति को शनि देव से कोई भय नहीं होता — वे ऐसों पर अनुग्रह करते हैं।

हनुमान जी के अनन्य भक्त माने जाते हैं शनि देव। इसीलिए कहा जाता है कि "हनुमान-भक्त को शनि कभी नहीं सताते।" शनिवार और मंगलवार को हनुमान चालीसा का पाठ शनि-दोष से बचाता है।

आरती

श्री शनि देव की आरती

शनिवार को विशेष रूप से गायी जाने वाली आरती
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जय जय श्री शनिदेव, भक्तन हितकारी ।
सूरज के पुत्र प्रभु, छाया महतारी ॥
श्याम अंग वक्र दृष्टि, चतुर्भुज धारी ।
नीलाम्बर धार नाथ, गज की असवारी ॥
क्रीट मुकुट शीश राजे, कुण्डल मुख जारी ।
हाथ धनुष, त्रिशूल चलावे, गदा अति प्यारी ॥
पिप्पल वृक्ष पर तेरी, राजती सवारी ।
दैत्य-असुर सब डरें, सुर भागम भारी ॥
शिवजी से वर पाकर, ग्रह में बने अधिकारी ।
तू है बड़ा सहायक, सुनहु मम विनती ॥
हो जब तेरी कृपा, सुख-समृद्धि अधिकारी ।
दुख-दारिद्र्य नाशक, कर्म-दण्ड-कारी ॥
इस आरती में शनि देव के दिव्य स्वरूप का वर्णन है — श्याम वर्ण, वक्र दृष्टि, चार भुजाएँ, नीले वस्त्र, हाथी की सवारी, मुकुट, धनुष-त्रिशूल और गदा धारी। शनि देव पीपल वृक्ष पर वास करते हैं — इसीलिए शनिवार को पीपल की पूजा का विशेष महत्व है। आरती में प्रार्थना है कि शनि की कृपा से सुख-समृद्धि बढ़े, दुख-दारिद्र्य का नाश हो। शनि कर्म के अनुसार ही दण्ड देते हैं, इसीलिए सद्कर्म करते रहना चाहिए।
मंत्र

शनि देव के मंत्र

साढ़े साती और शनि-दोष निवारण हेतु
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१. वैदिक शनि मंत्र:
ॐ शं शनैश्चराय नमः ॥

२. शनि गायत्री:
ॐ काकध्वजाय विद्महे, खड्ग-हस्ताय धीमहि ।
तन्नो मन्दः प्रचोदयात् ॥

३. शनि बीज मंत्र:
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः ॥

४. नवग्रह स्तोत्र (शनि श्लोक):
नीलाञ्जन समाभासं रवि-पुत्रं यमाग्रजम् ।
छाया-मार्ताण्ड-संभूतं तं नमामि शनैश्चरम् ॥
पहला मंत्र दैनिक जाप के लिए है। दूसरा शनि गायत्री है — काकध्वज (कौवे की ध्वजा वाले) शनि देव को जानने और ध्यान करने का। तीसरा बीज मंत्र साढ़े-साती और ढैय्या से पीड़ितों के लिए विशेष है — शनिवार को पीपल वृक्ष के नीचे १०८ बार जाप। चौथा श्लोक नवग्रह स्तोत्र का है — "नीलांजन (काले अंजन) के समान कांति वाले, सूर्य-पुत्र, यम के बड़े भाई, छाया और मार्ताण्ड (सूर्य) से उत्पन्न शनैश्चर को मैं प्रणाम करता हूँ।"
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स्तोत्र

दशरथ कृत शनि स्तोत्र (अंश)

राजा दशरथ द्वारा रचित शनि-शान्ति स्तोत्र
दशरथ कृत शनि स्तोत्र (अंश) YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
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नमः कृष्णाय नीलाय शिति-कण्ठ-निभाय च ।
नमः कालाग्नि-रूपाय कृतान्ताय च वै नमः ॥
नमो निर्मांस-देहाय दीर्घ-श्रुति-जटाय च ।
नमो विशाल-नेत्राय शुष्कोदर-भयानक ॥
नमः पुष्कल-गात्राय स्थूल-रोम्णेऽथ वै नमः ।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय नित्य-तृप्ताय वै नमः ॥
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ।
नमस्ते सर्व-भक्षाय बल-दाय नमो नमः ॥
सूर्य-पुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽनभयं कुरु ।
शनैश्चर नमस्तुभ्यं प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥
राजा दशरथ ने अयोध्या पर आ रही शनि की महादशा से बचाव हेतु यह स्तोत्र रचा था। इसके पाठ से शनि देव अत्यंत प्रसन्न हो गए और राजा से वरदान माँगने को कहा। यह स्तोत्र बहुत प्रभावशाली माना जाता है। शनिवार को सरसों के तेल का दीपक जलाकर इसका पाठ करने से शनि-दोष, साढ़े-साती और ढैय्या के दुष्प्रभाव कम होते हैं।

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शनि-दोष निवारण के उपाय

१. प्रत्येक शनिवार को हनुमान चालीसा का ११ बार पाठ करें।

२. शनिवार को पीपल वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएँ और सात बार परिक्रमा करें।

३. काले तिल, काले उड़द, सरसों का तेल, लोहे की वस्तुएँ — किसी जरूरतमंद को दान दें।

४. शनि देव की मूर्ति/प्रतिमा को सरसों के तेल से अभिषेक करें।

५. कौओं को रोटी खिलाएँ — शनि देव का वाहन कौवा माना जाता है।

६. सात्विक जीवन — सत्य बोलें, मांसाहार और मद्यपान से दूर रहें, माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करें।

७. शनि-शिंगणापुर (महाराष्ट्र) या तिरुनल्लार (तमिलनाडु) के दर्शन यदि संभव हो तो अवश्य करें।