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असतो मा सद्गमय · तमसो मा ज्योतिर्गमय · मृत्योर्मा अमृतं गमय

भगवान विष्णु

त्रिमूर्ति में पालनकर्ता — दशावतार के मूल, क्षीर-सागर-शायी, श्री-पति, परम-ब्रह्म स्वरूप

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मंत्र

विष्णु शान्ति मंत्र

द्वादशाक्षरी एवं अष्टाक्षरी विष्णु मंत्र
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ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
(द्वादशाक्षर — १२ अक्षर मंत्र)

ॐ नमो नारायणाय ॥
(अष्टाक्षर — ८ अक्षर मंत्र)

शान्ताकारं भुजगशयनं
पद्मनाभं सुरेशम् ।
विश्वाधारं गगनसदृशं
मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं
योगिभिर्ध्यानगम्यम् ।
वन्दे विष्णुं भवभयहरं
सर्वलोकैकनाथम् ॥

मङ्गलं भगवान् विष्णुः,
मङ्गलं गरुड़ध्वजः ।
मङ्गलं पुण्डरीकाक्षो,
मङ्गलायतनं हरिः ॥
"ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" विष्णु जी का सबसे शक्तिशाली द्वादशाक्षर (१२-अक्षरी) मंत्र है। "ॐ नमो नारायणाय" अष्टाक्षर मंत्र है। "शान्ताकारं भुजगशयनं" विष्णु जी के सगुण रूप का अद्भुत वर्णन — शेष-शय्या पर शयन, पद्म-नाभ, मेघ-समान श्याम-वर्ण, कमल-नयन, लक्ष्मी-पति। एकादशी, गुरुवार, और किसी भी शुभ कार्य के पूर्व जाप से विष्णु-कृपा।
आरती

ॐ जय जगदीश हरे

भगवान विष्णु की सर्व-प्रसिद्ध आरती
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ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे ।
भक्तजनों के संकट,
दास जनों के संकट
क्षण में दूर करे ॥
ॐ जय जगदीश हरे ॥

जो ध्यावे फल पावे,
दुख बिनसे मन का,
स्वामी दुख बिनसे मन का ।
सुख-सम्पत्ति घर आवे,
सुख-सम्पत्ति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का ॥

मात-पिता तुम मेरे,
शरण गहूँ मैं किसकी,
स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी ।
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूँ मैं जिसकी ॥

तुम पूरण परमात्मा,
तुम अन्तर्यामी,
स्वामी तुम अन्तर्यामी ।
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सबके स्वामी ॥

तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता,
स्वामी तुम पालनकर्ता ।
मैं मूरख खल कामी,
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता ॥

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राण-पति,
स्वामी सबके प्राण-पति ।
किस विधि मिलूँ दयामय,
किस विधि मिलूँ दयामय,
तुमको मैं कुमति ॥

दीनबन्धु दुख-हर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी ठाकुर तुम मेरे ।
अपने हाथ उठाओ,
अपनी शरण लगाओ,
द्वार पड़ा मैं तेरे ॥

विषय-विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वामी पाप हरो देवा ।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा ॥
"ॐ जय जगदीश हरे" आरती पंडित श्रद्धाराम फिल्लौरी द्वारा रचित (१८७० ई.) सम्पूर्ण भारत की सबसे लोकप्रिय आरती है। हर हिंदू घर में नित्य पाठ। इसमें भगवान विष्णु को जगदीश, माता-पिता, परब्रह्म, अंतर्यामी, करुणा-सागर, पालनकर्ता, दीनबंधु, दुःख-हर्ता कहा गया है। विषय-विकार, पाप, अहंकार के नाश और श्रद्धा-भक्ति की वृद्धि की प्रार्थना।
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स्तोत्र

विष्णु सहस्रनाम (आरंभिक भाग)

महाभारत से — एक हजार नामों का परम स्तोत्र
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ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः ।
भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः ॥१॥

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः ।
अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च ॥२॥

योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः ।
नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः ॥३॥

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः ।
सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः ॥४॥

स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ॥५॥

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ॥६॥
विष्णु सहस्रनाम महाभारत के अनुशासन-पर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को सुनाए गए हैं। एक हजार नामों में भगवान विष्णु की महिमा है। आदि शंकराचार्य, मधुसूदन सरस्वती, परसरामजी, परासरजी आदि अनेक आचार्यों ने इस पर भाष्य लिखे हैं। नित्य पाठ से सब प्रकार के पाप, रोग, शोक का नाश, मनोवांछित सिद्धि, मोक्ष-प्राप्ति। एकादशी, गुरुवार, और जन्म-दिन पर विशेष फलदायी। यहाँ प्रारंभिक छह श्लोक दिए गए हैं।

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