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असतो मा सद्गमय · तमसो मा ज्योतिर्गमय · मृत्योर्मा अमृतं गमय

स्तोत्र संग्रह

सनातन धर्म के प्रसिद्ध स्तोत्र — शिव तांडव, मधुराष्टकम्, लिंगाष्टकम्, राम रक्षा स्तोत्र, संकट नाशन गणेश स्तोत्र। संस्कृत पाठ और हिंदी अर्थ सहित।

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स्तोत्र क्या है?

स्तोत्र संस्कृत के "स्तु" धातु से बना है, जिसका अर्थ है — "स्तुति करना" या "गुणगान करना"। स्तोत्र किसी देवी-देवता की महिमा, गुणों, रूप, और लीलाओं का काव्य-रूप में वर्णन है। ये प्रायः ऋषि-मुनियों, संतों, और भक्तों द्वारा रचे गए हैं। नियमित स्तोत्र-पाठ से मन एकाग्र होता है, इष्ट-देव की कृपा प्राप्त होती है, और मानसिक शांति मिलती है।

स्तोत्र

शिव तांडव स्तोत्र (आरंभिक श्लोक)

रावण द्वारा रचित — कैलाश पर्वत उठाने के समय
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जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥
जिन भगवान शिव के घने जटा-जंगल से बहती हुई गंगा-जल से उनका कण्ठ-स्थल पवित्र है, जिन्होंने सर्पों की लम्बी माला धारण की है, जो डमरू बजाते हुए चण्ड तांडव कर रहे हैं — वे शिव हमारा कल्याण करें। जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें इठलाती हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि धधक रही है, जिनके मस्तक पर बाल-चंद्रमा शोभायमान है — उन शिव में मेरी प्रीति प्रत्येक क्षण बढ़े।
अष्टक

मधुराष्टकम्

श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित — श्री कृष्ण की मधुरता का अद्भुत वर्णन
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अधरं मधुरं वदनं मधुरं
नयनं मधुरं हसितं मधुरम् ।
हृदयं मधुरं गमनं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥१॥

वचनं मधुरं चरितं मधुरं
वसनं मधुरं वलितं मधुरम् ।
चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥२॥

वेणुर्मधुरो रेणुर्मधुरः
पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ ।
नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं
मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥३॥
श्री कृष्ण के अधर मधुर हैं, मुख मधुर है, नेत्र मधुर हैं, हँसी मधुर है, हृदय मधुर है, चलना मधुर है — मधुराधिपति (श्री कृष्ण) का सब कुछ मधुर है। उनके वचन, चरित्र, वस्त्र, गति — सब मधुर है। उनकी बांसुरी, चरण-धूल, हाथ, पाँव, नृत्य, सखा-भाव — सब मधुर है। यह स्तोत्र वल्लभ-संप्रदाय में अत्यंत प्रिय है। जन्माष्टमी या प्रत्येक एकादशी को इसका पाठ शुभ माना गया है।
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अष्टक

लिंगाष्टकम्

शिव-लिंग की महिमा का प्रसिद्ध स्तोत्र
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ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं
निर्मलभाषितशोभितलिङ्गम् ।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं
कामदहनकरुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥

सर्वसुगन्धसुलेपितलिङ्गं
बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं
तत्प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥
जो लिंग ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं द्वारा पूजित है, जो निर्मल भाषा से सुशोभित है, जो जन्म-जन्म के दुःखों का नाश करता है — उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ। जो देवों और श्रेष्ठ मुनियों द्वारा पूजित है, जिसने काम (कामदेव) को भस्म किया, जो करुणा का सागर है, जिसने रावण के दर्प (अहंकार) का नाश किया — उस सदाशिव लिंग को नमन। शिवरात्रि एवं प्रत्येक सोमवार को पाठ अति-फलदायी।
स्तोत्र

श्री राम रक्षा स्तोत्र (आरंभिक)

बुधकौशिक ऋषि द्वारा रचित — सम्पूर्ण रक्षा प्रदान करने वाला
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अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य
बुधकौशिक ऋषिः, श्रीसीतारामचन्द्र देवता ।
अनुष्टुप् छन्दः, सीता शक्तिः,
श्रीमद्हनुमान् कीलकम् ॥

श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्थे रामरक्षास्तोत्रजपे विनियोगः ॥

ध्यानम्
ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलदलस्पर्धिनेत्रं प्रसन्नम् ।
वामाङ्कारूढ-सीता-मुख-कमल-मिलल्लोचनं नीरदाभं
नानालङ्कार-दीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥
इस श्रीराम रक्षा स्तोत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, देवता श्रीसीताराम चंद्र हैं, छंद अनुष्टुप है, शक्ति सीता हैं, और कीलक श्रीहनुमान जी हैं। श्री राम चंद्र की प्रीति प्राप्ति हेतु इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। ध्यान-श्लोक का अर्थ: हम राम चंद्र का ध्यान करें — जिनकी भुजाएं घुटनों तक हैं, जो धनुष-बाण धारण किए हैं, पद्मासन में बैठे हैं, पीताम्बर पहनकर, कमल-दल जैसे नेत्रों से युक्त, सीताजी को बायीं ओर लिए हुए, मेघ के समान नील-वर्ण, अनेक आभूषणों से दीप्त, और बड़ी जटा-मण्डल वाले राम चंद्र। यह स्तोत्र भय, रोग, शत्रु से रक्षा करता है।
स्तोत्र

संकट नाशन गणेश स्तोत्र

नारद पुराण से — १२ नामों का स्तोत्र
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प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् ।
भक्तावासं स्मरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥

प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् ।
तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥
लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च ।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥
नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् ।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥
द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः ।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥
मस्तक झुकाकर देव गौरी-पुत्र विनायक को प्रणाम करके, भक्तों के निवास स्थान का स्मरण करना चाहिए — आयु, धन, अर्थ की सिद्धि के लिए। १२ नाम: १. वक्रतुण्ड, २. एकदन्त, ३. कृष्णपिङ्गाक्ष, ४. गजवक्त्र, ५. लम्बोदर, ६. विकट, ७. विघ्नराजेन्द्र, ८. धूम्रवर्ण, ९. भालचन्द्र, १०. विनायक, ११. गणपति, १२. गजानन। इन बारह नामों को जो व्यक्ति प्रातः-मध्याह्न-संध्या तीनों समय पढ़ता है, उसे विघ्नों का भय नहीं रहता — सर्व-सिद्धि की प्राप्ति होती है। बहुत प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली स्तोत्र है।
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अष्टक

अच्युताष्टकम्

श्री शंकराचार्य द्वारा रचित — विष्णु/कृष्ण के अनेक रूपों का स्तवन
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अच्युतं केशवं रामनारायणं
कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् ।
श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं
जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥

अच्युतं केशवं सत्यभामाधवं
माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् ।
इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं
देवकीनन्दनं नन्दजं सन्दधे ॥
मैं अच्युत (अनश्वर), केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपी-वल्लभ (गोपियों के प्रिय), जानकी-नायक (सीता के पति), रामचंद्र — का भजन करता हूँ। मैं अच्युत, केशव, सत्यभामा-पति, माधव, श्रीधर, राधिका-आराध्य, लक्ष्मी-निवास, चित्त-सुंदर, देवकी-नन्दन, नंद-पुत्र — का स्मरण करता हूँ। यह अष्टक भगवान विष्णु/कृष्ण के अनेक नामों एवं रूपों का सुंदर समन्वय है। प्रतिदिन पाठ से चित्त शुद्ध होता है।
अष्टक

बिल्वाष्टकम्

बिल्व-पत्र की महिमा एवं शिव-प्रिय स्तोत्र
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त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुषम् ।
त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च अच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।
तवपूजां करिष्यामि एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥
तीन दलों वाला, त्रिगुणों का स्वरूप, तीन नेत्रों जैसा, तीन आयुधों के समान — तीन जन्मों के पापों का नाश करने वाला यह बिल्व-पत्र शिव को अर्पण है। तीन शाखाओं वाले, छिद्र-रहित, कोमल, शुभ बिल्व-पत्रों से तेरी पूजा करूँगा — एक बिल्व-पत्र शिव को अर्पण है। बिल्व-वृक्ष का दर्शन और स्पर्श पाप-नाशक है, अघोर पापों का संहार करता है — यह एक बिल्व-पत्र शिव को अर्पण है। श्रावण मास और शिवरात्रि में पाठ विशेष फलदायी।
स्तोत्र

महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (ऐगिरि नंदिनी)

श्री शंकराचार्य द्वारा रचित — माँ दुर्गा का अद्भुत स्तवन
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (ऐगिरि नंदिनी) YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
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अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्व-विनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवर-विन्ध्य-शिरोऽधि-निवासिनि विष्णु-विलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठ-कुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते ।
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
हे पर्वत-पुत्री, पृथ्वी को आनंदित करने वाली, संसार को विनोद देने वाली, नंदी द्वारा पूजित, विंध्य-पर्वत-शिखर पर निवास करने वाली, विष्णु को मोहित करने वाली, जयशील, शिव-कुटुम्ब वाली, असंख्य कुटुम्ब वाली — हे महिषासुर मर्दिनि! तुम्हारी जय हो। श्रेष्ठ देवों पर वर्षा करने वाली, दुष्टों को नष्ट करने वाली, हर्ष की देवी, तीन लोकों का पोषण करने वाली, शिव को संतुष्ट करने वाली, पाप-नाशक, सिंधु-पुत्री — हे शैलसुते! तुम्हारी जय हो। नवरात्रि में पाठ अद्भुत फलदायी।

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स्तोत्र-पाठ की विधि

१. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।

२. पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके आसन पर बैठें।

३. इष्ट-देव की प्रतिमा/चित्र के समक्ष दीप जलाएं।

४. पहले संक्षिप्त ध्यान करें — मन को एकाग्र करें।

५. स्तोत्र का पाठ शांत, स्पष्ट उच्चारण से करें।

६. पाठ-समाप्ति पर "हरि ॐ तत्सत्" अथवा "ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:" बोलें।

७. अंत में प्रणाम करें।

स्तोत्र संस्कृत में हैं — परंतु शुद्ध उच्चारण न आए तो भी श्रद्धा-भाव से पाठ करना अधिक महत्वपूर्ण है। अभ्यास से उच्चारण भी सुधर जाता है।