सनातन धर्म के प्रसिद्ध स्तोत्र — शिव तांडव, मधुराष्टकम्, लिंगाष्टकम्, राम रक्षा स्तोत्र, संकट नाशन गणेश स्तोत्र। संस्कृत पाठ और हिंदी अर्थ सहित।
विज्ञापन स्थान (728×90)
स्तोत्र क्या है?
स्तोत्र संस्कृत के "स्तु" धातु से बना है, जिसका अर्थ है — "स्तुति करना" या "गुणगान करना"। स्तोत्र किसी देवी-देवता की महिमा, गुणों, रूप, और लीलाओं का काव्य-रूप में वर्णन है। ये प्रायः ऋषि-मुनियों, संतों, और भक्तों द्वारा रचे गए हैं। नियमित स्तोत्र-पाठ से मन एकाग्र होता है, इष्ट-देव की कृपा प्राप्त होती है, और मानसिक शांति मिलती है।
स्तोत्र
शिव तांडव स्तोत्र (आरंभिक श्लोक)
रावण द्वारा रचित — कैलाश पर्वत उठाने के समय
शिव तांडव स्तोत्र (आरंभिक श्लोक)YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
जिन भगवान शिव के घने जटा-जंगल से बहती हुई गंगा-जल से उनका कण्ठ-स्थल पवित्र है, जिन्होंने सर्पों की लम्बी माला धारण की है, जो डमरू बजाते हुए चण्ड तांडव कर रहे हैं — वे शिव हमारा कल्याण करें। जिनकी जटाओं में गंगा की लहरें इठलाती हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि धधक रही है, जिनके मस्तक पर बाल-चंद्रमा शोभायमान है — उन शिव में मेरी प्रीति प्रत्येक क्षण बढ़े।
अष्टक
मधुराष्टकम्
श्री वल्लभाचार्य द्वारा रचित — श्री कृष्ण की मधुरता का अद्भुत वर्णन
श्री कृष्ण के अधर मधुर हैं, मुख मधुर है, नेत्र मधुर हैं, हँसी मधुर है, हृदय मधुर है, चलना मधुर है — मधुराधिपति (श्री कृष्ण) का सब कुछ मधुर है। उनके वचन, चरित्र, वस्त्र, गति — सब मधुर है। उनकी बांसुरी, चरण-धूल, हाथ, पाँव, नृत्य, सखा-भाव — सब मधुर है। यह स्तोत्र वल्लभ-संप्रदाय में अत्यंत प्रिय है। जन्माष्टमी या प्रत्येक एकादशी को इसका पाठ शुभ माना गया है।
जो लिंग ब्रह्मा, विष्णु और देवताओं द्वारा पूजित है, जो निर्मल भाषा से सुशोभित है, जो जन्म-जन्म के दुःखों का नाश करता है — उस सदाशिव लिंग को मैं प्रणाम करता हूँ। जो देवों और श्रेष्ठ मुनियों द्वारा पूजित है, जिसने काम (कामदेव) को भस्म किया, जो करुणा का सागर है, जिसने रावण के दर्प (अहंकार) का नाश किया — उस सदाशिव लिंग को नमन। शिवरात्रि एवं प्रत्येक सोमवार को पाठ अति-फलदायी।
स्तोत्र
श्री राम रक्षा स्तोत्र (आरंभिक)
बुधकौशिक ऋषि द्वारा रचित — सम्पूर्ण रक्षा प्रदान करने वाला
श्री राम रक्षा स्तोत्र (आरंभिक)YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
इस श्रीराम रक्षा स्तोत्र के ऋषि बुधकौशिक हैं, देवता श्रीसीताराम चंद्र हैं, छंद अनुष्टुप है, शक्ति सीता हैं, और कीलक श्रीहनुमान जी हैं। श्री राम चंद्र की प्रीति प्राप्ति हेतु इस स्तोत्र का पाठ किया जाता है। ध्यान-श्लोक का अर्थ: हम राम चंद्र का ध्यान करें — जिनकी भुजाएं घुटनों तक हैं, जो धनुष-बाण धारण किए हैं, पद्मासन में बैठे हैं, पीताम्बर पहनकर, कमल-दल जैसे नेत्रों से युक्त, सीताजी को बायीं ओर लिए हुए, मेघ के समान नील-वर्ण, अनेक आभूषणों से दीप्त, और बड़ी जटा-मण्डल वाले राम चंद्र। यह स्तोत्र भय, रोग, शत्रु से रक्षा करता है।
स्तोत्र
संकट नाशन गणेश स्तोत्र
नारद पुराण से — १२ नामों का स्तोत्र
संकट नाशन गणेश स्तोत्रYouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् । तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च । सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्णं तथाष्टमम् ॥ नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् । एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । न च विघ्नभयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥
अर्थ एवं भावार्थ
मस्तक झुकाकर देव गौरी-पुत्र विनायक को प्रणाम करके, भक्तों के निवास स्थान का स्मरण करना चाहिए — आयु, धन, अर्थ की सिद्धि के लिए। १२ नाम: १. वक्रतुण्ड, २. एकदन्त, ३. कृष्णपिङ्गाक्ष, ४. गजवक्त्र, ५. लम्बोदर, ६. विकट, ७. विघ्नराजेन्द्र, ८. धूम्रवर्ण, ९. भालचन्द्र, १०. विनायक, ११. गणपति, १२. गजानन। इन बारह नामों को जो व्यक्ति प्रातः-मध्याह्न-संध्या तीनों समय पढ़ता है, उसे विघ्नों का भय नहीं रहता — सर्व-सिद्धि की प्राप्ति होती है। बहुत प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली स्तोत्र है।
विज्ञापन स्थान (336×280)
अष्टक
अच्युताष्टकम्
श्री शंकराचार्य द्वारा रचित — विष्णु/कृष्ण के अनेक रूपों का स्तवन
मैं अच्युत (अनश्वर), केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि, श्रीधर, माधव, गोपी-वल्लभ (गोपियों के प्रिय), जानकी-नायक (सीता के पति), रामचंद्र — का भजन करता हूँ। मैं अच्युत, केशव, सत्यभामा-पति, माधव, श्रीधर, राधिका-आराध्य, लक्ष्मी-निवास, चित्त-सुंदर, देवकी-नन्दन, नंद-पुत्र — का स्मरण करता हूँ। यह अष्टक भगवान विष्णु/कृष्ण के अनेक नामों एवं रूपों का सुंदर समन्वय है। प्रतिदिन पाठ से चित्त शुद्ध होता है।
तीन दलों वाला, त्रिगुणों का स्वरूप, तीन नेत्रों जैसा, तीन आयुधों के समान — तीन जन्मों के पापों का नाश करने वाला यह बिल्व-पत्र शिव को अर्पण है। तीन शाखाओं वाले, छिद्र-रहित, कोमल, शुभ बिल्व-पत्रों से तेरी पूजा करूँगा — एक बिल्व-पत्र शिव को अर्पण है। बिल्व-वृक्ष का दर्शन और स्पर्श पाप-नाशक है, अघोर पापों का संहार करता है — यह एक बिल्व-पत्र शिव को अर्पण है। श्रावण मास और शिवरात्रि में पाठ विशेष फलदायी।
स्तोत्र
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (ऐगिरि नंदिनी)
श्री शंकराचार्य द्वारा रचित — माँ दुर्गा का अद्भुत स्तवन
महिषासुर मर्दिनी स्तोत्र (ऐगिरि नंदिनी)YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्व-विनोदिनि नन्दिनुते गिरिवर-विन्ध्य-शिरोऽधि-निवासिनि विष्णु-विलासिनि जिष्णुनुते । भगवति हे शितिकण्ठ-कुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते । दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥
अर्थ एवं भावार्थ
हे पर्वत-पुत्री, पृथ्वी को आनंदित करने वाली, संसार को विनोद देने वाली, नंदी द्वारा पूजित, विंध्य-पर्वत-शिखर पर निवास करने वाली, विष्णु को मोहित करने वाली, जयशील, शिव-कुटुम्ब वाली, असंख्य कुटुम्ब वाली — हे महिषासुर मर्दिनि! तुम्हारी जय हो। श्रेष्ठ देवों पर वर्षा करने वाली, दुष्टों को नष्ट करने वाली, हर्ष की देवी, तीन लोकों का पोषण करने वाली, शिव को संतुष्ट करने वाली, पाप-नाशक, सिंधु-पुत्री — हे शैलसुते! तुम्हारी जय हो। नवरात्रि में पाठ अद्भुत फलदायी।