संतोषी माँ को भगवान गणेश और देवी रिद्धि-सिद्धि की पुत्री माना जाता है। एक प्रसिद्ध लोक-कथा अनुसार, जब रक्षाबंधन के दिन गणेश जी की बहन ने राखी बाँधी, तो उनके दोनों पुत्र शुभ और लाभ ने माँ से कहा — "हमारी भी कोई बहन हो जो हमें राखी बाँधे।" उनकी प्रार्थना पर देवी पार्वती और भगवान गणेश ने एक अद्भुत कन्या प्रकट की — जिसका नाम पड़ा "संतोषी" — संतोष देने वाली देवी।
संतोषी माँ १६ शुक्रवारों के व्रत से प्रसन्न होती हैं। उनकी पूजा बहुत सरल है — गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाएँ, दीप जलाएँ, "जय संतोषी माँ" का जाप करें। व्रत के दिन खट्टी चीजें (नींबू, इमली, खटाई) नहीं खानी चाहिए — यह अनिवार्य नियम है।
१९७५ में आई हिंदी फिल्म "जय संतोषी माँ" से इनकी पूजा अत्यंत लोकप्रिय हो गई। आज देश भर में लाखों भक्त — विशेषकर महिलाएँ — १६ शुक्रवार का व्रत रखती हैं। माँ की कृपा से दाम्पत्य-सुख, संतान-सुख और घरेलू कलह का निवारण होता है।
जय संतोषी माता, मैया जय संतोषी माता । अपने सेवक जन को सुख-सम्पत्ति दाता ॥ सुन्दर चीर सुनहरी, माँ धारण कीन्हो । हीरा-पन्ना दमके, तन-श्रृंगार लीन्हो ॥ गेरू लाल छटा छवि, बदन कमल सोहे । मन्द हँसत मुख-मण्डल, देव-मुनि मन मोहे ॥ स्वर्ण सिंहासन बैठी, चँवर ढुरे प्यारे । धूप, दीप, मधु, मेवा, भोग धरें न्यारे ॥ गुड़ और चने का प्रसाद बहुत भावे । संतोषी माँ की पूजन हर शुक्रवार आवे ॥ जो जन ध्यावे फल पावे, दु:ख से मुक्ति होवे । कर जोड़े विनती करूँ, माँ कष्ट मेरा खोवे ॥ संतोषी माँ की आरती जो जन गावे । ऋद्धि-सिद्धि सुख-सम्पत्ति घर में पावे ॥
अर्थ एवं भावार्थ
इस आरती में संतोषी माँ के दिव्य रूप का सुंदर वर्णन है — सुनहरी चीर, हीरा-पन्ना के आभूषण, गेरू-लाल कांति, कमल-समान मुख, स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान, चँवर ढुर रहे हैं। माँ को धूप, दीप, मधु, मेवा का भोग, और विशेष रूप से गुड़-चने का प्रसाद अति प्रिय है। प्रत्येक शुक्रवार को विधिवत पूजन करने से ऋद्धि-सिद्धि, सुख-सम्पत्ति और दुखों से मुक्ति मिलती है।
मंत्र
श्री संतोषी माता मंत्र
सरल बीज मंत्र — दैनिक जाप हेतु
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जय संतोषी माँ, जय संतोषी माँ । संकट हरो माँ, सुख दो माँ ॥
अर्थ एवं भावार्थ
यह संतोषी माँ का सरल और शक्तिशाली मूल मंत्र है। प्रतिदिन सुबह-शाम १०८ बार जाप करने से माँ की कृपा प्राप्त होती है। विशेषकर शुक्रवार को व्रत के समय जाप करें। यह मंत्र संतोष-वृत्ति, मानसिक शांति, घर में सुख-सम्पत्ति और दाम्पत्य-सुख प्रदान करता है।
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व्रत कथा
संतोषी माँ की व्रत-कथा (संक्षिप्त)
१६ शुक्रवार व्रत की कथा
संतोषी माँ की व्रत-कथा (संक्षिप्त)YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
एक नगर में एक बुढ़िया थी — उसके सात पुत्र थे। छः कमाने वाले और एक निकम्मा। बुढ़िया छ: को भोजन परोसती और जूठन सातवें को देती। एक दिन सातवें पुत्र ने यह जान लिया तो दु:खी होकर परदेस चला गया।
परदेस में वह एक सेठ के यहाँ नौकर बन गया। समय बीतता गया। उसकी पत्नी (जो पीछे ससुराल में ही थी) सास के बहुत ताने सुनती। एक दिन वह दु:खी होकर मंदिर गई — वहाँ कुछ स्त्रियाँ संतोषी माँ का व्रत कर रहीं थीं। उसने भी १६ शुक्रवार के व्रत का संकल्प लिया।
१६वें शुक्रवार पूर्ण होते ही उसका पति परदेस से धनवान बनकर लौट आया। संतोषी माँ ने सब का कल्याण किया। तब से इस व्रत का नियमित प्रचलन हुआ।
व्रत-विधि: १. प्रातः स्नान करें। २. उस दिन खट्टा कुछ न खाएँ (नींबू, इमली, अमचूर भी नहीं)। ३. एक बार भोजन (फलाहार)। ४. दीप जलाएँ, गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाएँ। ५. आरती करें, कथा सुनें। ६. १६वें शुक्रवार को उद्यापन करें।
अर्थ एवं भावार्थ
संतोषी माँ की यह कथा १६ शुक्रवार व्रत की अधिकृत कथा है। इसमें संदेश है कि श्रद्धा-पूर्वक व्रत करने से माँ हर असंभव-सी लगने वाली समस्या को हल कर देती हैं। महत्वपूर्ण नियम — व्रत के दिन कोई भी खट्टी वस्तु न खाएँ। १६वें शुक्रवार को उद्यापन करें — आठ बच्चों को बुलाकर खीर-पूरी का भोजन कराएँ। माँ की कृपा से सुख, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है।