भगवान शिव की सबसे पावन रात्रि — फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी
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परिचय
महाशिवरात्रि हिंदू धर्म का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जो फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी की रात्रि को मनाया जाता है। यह वर्ष की १२ शिवरात्रियों में सबसे पावन है। शास्त्रों के अनुसार इसी रात्रि भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। साथ ही इसी रात्रि शिव "लिंग रूप" में अनादि-अनंत ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रकट हुए थे।
"शिवरात्रि" का अर्थ है "शिव की रात्रि।" इस रात्रि का जागरण, उपवास, शिव-पूजन, मंत्र-जाप, और रुद्राभिषेक करने से असीम पुण्य की प्राप्ति होती है।
पौराणिक कथाएँ
१. शिव-पार्वती विवाह: माता पार्वती ने भगवान शिव को पति-रूप में पाने के लिए वर्षों कठोर तपस्या की। प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें वरदान दिया और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को उनसे विवाह किया। इसी कारण शिवरात्रि को "शिव-शक्ति मिलन" की रात्रि भी कहते हैं।
२. समुद्र मंथन एवं विषपान: समुद्र मंथन के समय जब हलाहल विष निकला, तब सम्पूर्ण सृष्टि के विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने वह विष पी लिया। पार्वती जी ने उनका कण्ठ पकड़ लिया, और विष कण्ठ में ही रुक गया — इसी कारण वे "नीलकण्ठ" कहलाए। देवताओं ने रात-भर जागकर उनकी आराधना की — यही शिवरात्रि-जागरण की परंपरा बनी।
३. लिंग-रूप प्रकटन: एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में विवाद हुआ कि कौन श्रेष्ठ है। तब एक अनादि-अनंत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। ब्रह्मा ने ऊपर की ओर खोजा, विष्णु ने नीचे की ओर — किसी को अंत नहीं मिला। तभी आकाशवाणी हुई — "मैं ही ब्रह्म हूँ, मैं ही सत्य हूँ।" यह दिन फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी था।
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शिकारी एवं बेल-पत्र की कथा
एक शिकारी जंगल में शिकार के लिए गया था। शाम होने पर एक बेल-वृक्ष पर चढ़कर उसने रात बिताने का निर्णय किया। दुर्भाग्य से वह दिन शिवरात्रि था, परंतु शिकारी अनभिज्ञ था।
रात-भर भूख-प्यास से उसकी नींद नहीं आई। जागते हुए वह अनजाने में बेल-पत्र तोड़कर नीचे गिराता रहा — जो ठीक एक शिवलिंग पर गिरते रहे। साथ ही उसकी आंखों के आँसू भी जल-रूप में लिंग पर गिरते रहे। इस प्रकार उसने अनजाने में सम्पूर्ण रात्रि शिव-जागरण, बिल्व-पत्र अर्पण, और जलाभिषेक किया।
भगवान शिव ने प्रसन्न होकर उसके सब पाप क्षमा कर दिए और मोक्ष प्रदान किया। यह कथा बताती है कि अनजाने में भी शिव-पूजा अद्भुत फल देती है — फिर श्रद्धा से किया गया कैसा परिणाम लाएगा!
व्रत विधि एवं चार प्रहर पूजा
दिन-भर: उपवास/फलाहार। केवल फल, दूध, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा।
रात्रि-जागरण: सम्पूर्ण रात्रि भगवान शिव की आराधना एवं जागरण। यह व्रत का सबसे विशेष अंग है।
चार प्रहर पूजा: रात्रि के चार प्रहरों (3-3 घंटे) में अलग-अलग द्रव्यों से पूजा करें —
• प्रथम प्रहर (6-9 PM): दूध से अभिषेक
• द्वितीय प्रहर (9 PM-12 AM): दही से अभिषेक
• तृतीय प्रहर (12-3 AM): घी से अभिषेक
• चतुर्थ प्रहर (3-6 AM): शहद से अभिषेक
हर प्रहर में बिल्व-पत्र, धतूरा, भांग, सफेद फूल, चंदन अर्पण करें। "ॐ नमः शिवाय" का अखंड जाप करते रहें।
ॐ जय शिव ओंकारा, स्वामी जय शिव ओंकारा । ब्रह्मा-विष्णु-सदाशिव, अर्धांगी धारा ॥ एकानन चतुरानन पंचानन राजे । हंसासन-गरुड़ासन वृषवाहन साजे ॥ दो भुज चार चतुर्भुज दशभुज अति सोहे । तीनों रूप निरखता त्रिभुवन जन मोहे ॥ अक्षमाला वनमाला, मुण्डमाला धारी । चंदन मृगमद सोहै, भाले शशिधारी ॥ श्वेताम्बर पीताम्बर, बाघम्बर अंगे । सनकादिक गरुड़ादिक, भूतादिक संगे ॥
अर्थ एवं भावार्थ
महाशिवरात्रि की रात्रि में सबसे पहले गायी जाने वाली यह विश्व-प्रसिद्ध आरती है। इसमें शिव को ओंकार-स्वरूप, ब्रह्मा-विष्णु-सदाशिव त्रिमूर्ति का संगम, अर्धनारीश्वर रूप में पार्वती के साथ एक-शरीर, और एक-मुख से लेकर पाँच-मुख तक सभी रूपों में वर्णित किया गया है। उनके दो, चार, और दश भुजाएं — सब त्रिभुवन को मोहित करते हैं।
१. पंचाक्षर मंत्र: ॐ नमः शिवाय (1008 बार जाप शिवरात्रि की रात्रि में करें)
२. महामृत्युंजय मंत्र: ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ (108 बार जाप रोग-शोक एवं अकाल मृत्यु से रक्षा)
३. रुद्र मंत्र: ॐ नमो भगवते रुद्राय (कठिन समय में सहारा)
४. शिव गायत्री: ॐ तत्पुरुषाय विद्महे । महादेवाय धीमहि । तन्नो रुद्रः प्रचोदयात् ॥
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शिवरात्रि के लाभ
• मनोवांछित जीवनसाथी की प्राप्ति (अविवाहित)
• वैवाहिक जीवन में सुख-शांति
• सम्पूर्ण पाप-क्षय
• मोक्ष-प्राप्ति का सबसे सरल मार्ग
• स्वास्थ्य-लाभ एवं दीर्घायु
• मानसिक शक्ति एवं एकाग्रता