पति की दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि हेतु सुहागिनों का सबसे पावन व्रत — कार्तिक कृष्ण चतुर्थी
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परिचय
करवा चौथ हिंदू सुहागिन स्त्रियों का सबसे महत्वपूर्ण व्रत है, जो कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (अमावस्या से चार दिन पहले) को मनाया जाता है। इस दिन पत्नियाँ अपने पति की दीर्घायु, स्वास्थ्य, और सुख-समृद्धि के लिए प्रात: सूर्योदय से लेकर रात्रि चंद्रोदय तक निर्जल (बिना पानी के) व्रत रखती हैं।
"करवा" का अर्थ है मिट्टी का पात्र (कलश), और "चौथ" चतुर्थी (चौथी तिथि)। इस दिन करवे में पानी भरकर पूजा की जाती है — इसी कारण इसे "करवा चौथ" कहा गया।
पौराणिक कथा (वीरावती की कथा)
प्राचीन काल में एक नगर में एक श्रेष्ठी के सात पुत्र और एक सुंदर पुत्री "वीरावती" थी। विवाह के पश्चात वीरावती अपने मायके आई और जब करवा चौथ का व्रत आया, तो उसने भी सुहागिनों के साथ निर्जल व्रत रखा।
दिन-भर भूखी-प्यासी रहने से वीरावती की हालत बिगड़ने लगी। भाई बहन से बहुत प्रेम करते थे — उनसे बहन का यह कष्ट देखा नहीं गया। उन्होंने एक चाल चली: नगर के बाहर एक पीपल के पेड़ पर मशाल जलाकर लटका दी। फिर बहन को छत पर ले जाकर बोले — "देख, चांद निकल आया है। अब तू अर्घ्य देकर भोजन कर ले।"
वीरावती ने झूठे चांद को असली समझ लिया, अर्घ्य दिया, और भोजन किया। पर जैसे ही उसने पहला कौर मुँह में रखा — पति की मृत्यु का समाचार आ गया। वह विलाप करते हुए ससुराल पहुँची।
तब इन्द्राणी देवी प्रकट हुईं और बोलीं — "तूने व्रत-नियम तोड़ा है। अब प्रत्येक मास की चतुर्थी को व्रत रखकर पश्चाताप कर। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी पर पुनः विधिवत व्रत करने पर पति जीवित होगा।" वीरावती ने १२ महीने तक हर चतुर्थी पर व्रत किया, और १३वीं चतुर्थी (करवा चौथ) पर पूर्ण व्रत किया। इन्द्राणी प्रसन्न हुईं और उसके पति को पुनर्जीवित कर दिया।
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व्रत विधि
१. प्रातः: सरगी — सास द्वारा बहू को सूर्योदय से पूर्व ४ बजे फलाहार/मिठाई/अन्न दिया जाता है, जिसे "सरगी" कहते हैं। यह व्रत-धारिनी की दिन-भर की ऊर्जा का स्रोत होती है।
२. श्रृंगार: स्नान कर सोलह श्रृंगार करें — लाल/गुलाबी साड़ी या चुनरी, मेहंदी, चूड़ियाँ, बिंदी, सिंदूर, मांगटीका, झुमके, गले की लच्छी, बाजूबंद, पायल। यह "सुहाग का सिंगार" कहलाता है।
३. दिन-भर निर्जल व्रत: दिन-भर पानी भी न पिएं, अन्न-जल त्यागें। मन में पति की आयु एवं कल्याण की कामना रखें।
४. सायंकाल पूजा: शाम को मित्र-सहेलियों के साथ एकत्र होकर सामूहिक पूजा करें। चौकी पर माँ करवा, भगवान शिव-पार्वती, गणेश जी और चंद्रमा का चित्र/प्रतिमा रखें।
५. करवा-स्थापना: मिट्टी के करवे में पानी भरें। ऊपर सिंदूर लगाएं, कुमकुम-चावल चढ़ाएं। एक करवा देवी के लिए, एक स्वयं के लिए।
६. कथा-वाचन: सब सुहागिनें मिलकर "करवा चौथ की कथा" सुनें/पढ़ें।
७. चंद्र-दर्शन एवं पारणा: रात्रि में चंद्रमा के उदय के बाद, छलनी से पहले चंद्रमा को देखें, फिर अपने पति को देखें। पति के हाथ से जल पीकर व्रत खोलें। तदुपरांत पति के साथ भोजन करें।
आरती
श्री करवा चौथ माता की आरती
व्रत-पूजन के समय गायी जाने वाली आरती
श्री करवा चौथ माता की आरतीYouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
ॐ जय करवा माता, माता जय करवा माता । तुम्हीं हो सुहागिनों की रक्षक, सुहाग धन-धाता ॥ मृत पति को जिलाया, वीरावती के घर में । जय जय करवा माई, हम तेरे शरण में ॥ दूज की चाँद-सी प्यारी, माँग-सिन्दूर सजाने वाली । सुहागिनों के अरमान-सम्मान की पालन-हारी ॥ निर्जल व्रत हम रख कर, करते हैं आराधना । हमारे सुहाग की रक्षा, करना हे माँ करवा ॥
अर्थ एवं भावार्थ
इस आरती में करवा माता को सुहागिनों का रक्षक, सुहाग एवं धन-धाता बताया गया है। वीरावती की कथा का स्मरण किया गया है। माँ करवा से प्रार्थना है कि वे प्रत्येक सुहागिन के सुहाग की रक्षा करें, उसके अरमान-सम्मान की पालन-हार बनें। कार्तिक कृष्ण चतुर्थी की रात्रि चंद्रोदय के पश्चात पूजा-समय यह आरती गाई जाती है।
आज के समय में करवा चौथ केवल पति-पत्नी का त्योहार न रहकर, परिवार और सहेलियों का सामूहिक उत्सव बन गया है। बॉलीवुड फिल्मों और टीवी धारावाहिकों ने इस व्रत को नई पहचान दी है। दिल्ली-NCR, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान — इन सब क्षेत्रों में यह बहुत हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
कुछ स्थानों पर अब अविवाहित युवतियाँ भी अपने प्रेमी/मनचाहे जीवनसाथी के लिए यह व्रत रखती हैं। साथ ही कई आधुनिक पतियों ने भी अपनी पत्नियों के साथ निर्जल व्रत रखकर "साझा करवा चौथ" की एक नई परंपरा शुरू की है — जो वैवाहिक प्रेम का सुंदर प्रतीक है।