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गणेश चतुर्थी

भगवान गणेश के जन्म का पावन उत्सव — भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी

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परिचय

गणेश चतुर्थी (विनायक चतुर्थी) हिंदू धर्म का प्रमुख पर्व है, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से अनंत चतुर्दशी (दस दिन) तक मनाया जाता है। यह श्री गणेश के जन्म का उत्सव है। महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, गुजरात, और अब सम्पूर्ण भारत में यह पर्व बहुत भव्यता से मनाया जाता है।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने 1893 में सार्वजनिक गणेशोत्सव की शुरुआत की थी ताकि भारतीयों में एकता और स्वतंत्रता-भाव का संचार हो। तब से यह सामूहिक त्योहार बन गया।

गणेश-जन्म की कथा

एक बार माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। उन्होंने अपने शरीर के मैल से एक सुंदर बालक बनाया और उसमें प्राण फूंके। उन्होंने उस बालक को पहरेदार बनाया और कहा — "जब तक मैं स्नान कर रही हूँ, किसी को भी अंदर मत आने देना।"

उसी समय भगवान शिव कैलाश लौटे और भीतर जाने लगे। बालक ने उन्हें रोक दिया। शिव जी क्रोधित हो गए और गणों ने युद्ध आरंभ किया, परंतु बालक ने सबको हरा दिया। अंत में शिव जी ने स्वयं अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया।

जब पार्वती जी ने देखा, तो वे विलाप करने लगीं। शिव जी को अपनी भूल का एहसास हुआ। उन्होंने आदेश दिया कि "उत्तर दिशा में सबसे पहले जो प्राणी मिले, उसका सिर ले आओ।" गणों को एक हाथी का बच्चा मिला। शिव जी ने हाथी का सिर बालक के धड़ पर लगाया और उसमें पुनः प्राण फूंके।

शिव जी ने उस बालक को सब देवताओं में सबसे पहले पूजे जाने का वरदान दिया, उसे अपने गणों का स्वामी बनाया — इसीलिए वह "गणेश" (गणों का ईश) और "गणपति" (गणों के पति) कहलाए।

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१० दिनों का उत्सव

दिन १ — चतुर्थी: गणेश-स्थापना। मिट्टी की प्रतिमा घर/पंडाल में स्थापित। सुबह "प्राण-प्रतिष्ठा" विधि।

दिन २-९: प्रतिदिन प्रातः-सायं आरती, अभिषेक, मोदक भोग, भजन-कीर्तन। पंडालों में सांस्कृतिक कार्यक्रम।

दिन १० — अनंत चतुर्दशी: "गणपति विसर्जन" — प्रतिमा को नदी, समुद्र, या तालाब में विसर्जित किया जाता है। गाजे-बाजे, ढोल-ताशे, "गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ" के नारों के साथ। यह सबसे भावुक क्षण होता है।

पूजा विधि

१. स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें।

२. मिट्टी (इको-फ्रेंडली) या पीतल/चांदी की गणेश प्रतिमा स्थापित करें।

३. कलश-स्थापना, गंगाजल छिड़काव।

४. चंदन-अक्षत-कुमकुम तिलक, २१ दूर्वा (दूब घास) अर्पण।

५. लाल वस्त्र, लाल पुष्प, सिंदूर अर्पण।

६. मोदक का भोग — गणेश जी को सबसे प्रिय।

७. "ॐ गं गणपतये नमः" का 108 बार जाप।

८. गणेश आरती ("जय गणेश जय गणेश देवा")।

९. गणेश चालीसा का पाठ।

१०. क्षमा-प्रार्थना, प्रसाद वितरण।

आरती

जय गणेश जय गणेश देवा

गणेश चतुर्थी की प्रमुख आरती
जय गणेश जय गणेश देवा YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
सुनें
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
एकदन्त दयावन्त, चार भुजाधारी ।
माथे सिन्दूर सोहै, मूसे की सवारी ॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया ।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया ॥
"सूर" श्याम शरण आये, सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा ॥
इस अति-प्रसिद्ध आरती में गणेश जी के स्वरूप एवं शक्तियों का सुंदर वर्णन है — एक दाँत वाले, अत्यंत दयावान, चार भुजाओं वाले, माथे पर सिन्दूर लगाए हुए, मूषक (चूहा) पर सवार। उनकी कृपा से अंधे को नेत्र मिलते हैं, कोढ़ी को सुंदर शरीर, निःसंतान को पुत्र, और निर्धन को धन। संत सूरदास ने यह रचना की थी। प्रत्येक गणेश-पूजन के अंत में यह आरती गाई जाती है।

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मोदक — गणेश जी का प्रिय भोग

मोदक (मोदन = आनंद देने वाला) गणेश जी का सबसे प्रिय प्रसाद है। शास्त्रों में कहा गया है कि गणेश जी को 21 मोदक चढ़ाने से सब विघ्न दूर होते हैं और मनोवांछित फल मिलता है।

मुख्य प्रकार: उकडीचे मोदक (भापे हुए, चावल के आटे की मीठी मणी), तले हुए मोदक, कोकोनट मोदक, चॉकलेट मोदक (आधुनिक)।

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गणेश-विसर्जन एवं पर्यावरण

आजकल जल-प्रदूषण की चिंता को देखते हुए "इको-फ्रेंडली गणेशा" का प्रचलन बढ़ रहा है। मिट्टी की प्रतिमा (Plaster of Paris नहीं), प्राकृतिक रंग, और घर के बगीचे/बाल्टी में विसर्जन — यह नया चलन है। गणेश जी "विघ्नहर्ता" हैं — वे प्रकृति के विघ्न (प्रदूषण) से भी हमारी रक्षा चाहते हैं।