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छठ पूजा

सूर्य उपासना का सबसे कठोर एवं भव्य पर्व — कार्तिक शुक्ल षष्ठी

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परिचय

छठ पूजा हिंदू धर्म का सबसे प्राचीन सूर्य-उपासना पर्व है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी (छठी तिथि) के आसपास, कुल चार दिनों तक मनाया जाता है। इसी कारण इसे "छठ" कहते हैं। यह पर्व विशेष रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश, और नेपाल में बहुत भव्यता से मनाया जाता है। बिहार के सीमावर्ती राज्यों — बंगाल, मध्य प्रदेश — में भी यह लोकप्रिय है।

छठ पूजा भगवान सूर्य देव और छठी मैया (देवी उषा / सूर्य की पत्नी / प्रकृति के छठे अंश) को समर्पित है। इसमें सूर्य और जल की पूजा की जाती है — यह एकमात्र पर्व है जिसमें उगते और डूबते दोनों सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

छठ पूजा को विश्व का सबसे कठोर हिंदू व्रत माना जाता है — ३६ घंटे तक निर्जल (बिना पानी के) उपवास।

पौराणिक कथाएँ

१. द्रौपदी की कथा: महाभारत में जब पाँडव वनवास में थे और भोजन-धन की कठिनाई थी, तब महर्षि धौम्य के निर्देश पर द्रौपदी ने छठ-व्रत किया। फलस्वरूप पाँडवों को राज्य पुनः प्राप्त हुआ।

२. कर्ण की कथा: महाभारत के दानवीर कर्ण सूर्य-पुत्र थे। वे प्रतिदिन घंटों जल में खड़े रहकर सूर्य को अर्घ्य देते थे। उन्हीं की परंपरा छठ पूजा में निभाई जाती है।

३. ऋग्वेद की कथा: ऋग्वेद के सूर्य-सूक्त में भगवान सूर्य की उपासना का वर्णन है। यह छठ पूजा का वैदिक आधार है।

४. राम-सीता की कथा: लंका विजय के बाद अयोध्या लौटे श्री राम और माता सीता ने मुनि वशिष्ठ के निर्देश पर छठ-व्रत किया था।

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चार दिनों का व्रत

दिन १ — नहाय खाय (कार्तिक शुक्ल चतुर्थी): व्रती (व्रत-धारक) पवित्र नदी/तालाब में स्नान करती है। फिर चना दाल, लौकी की सब्जी, अरवा (बिना नमक का) चावल का सात्विक भोजन करती है। यह व्रत का आरंभ।

दिन २ — खरना/लोहंडा (पंचमी): दिन-भर निर्जल व्रत। शाम को मिट्टी के चूल्हे पर गुड़ की खीर (रसियाव) बनाई जाती है। पूजा के बाद व्रती और परिवार खीर ग्रहण करते हैं। यह अंतिम भोजन — फिर अगले 36 घंटे निर्जल उपवास।

दिन ३ — संध्या अर्घ्य (षष्ठी): सम्पूर्ण दिन निर्जल। शाम को व्रती परिवार सहित घाट (नदी, तालाब, या घर के पानी से बनाए कृत्रिम जल-स्रोत) पर जाती है। बाँस की डलिया (टोकरी, सूप) में ठेकुआ (आटे की मिठाई), फल (नारियल, सेव, केला, संतरा, गन्ना), मिठाइयाँ रखकर ले जाती है। पानी में खड़े होकर डूबते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।

दिन ४ — उषा अर्घ्य / पारण (सप्तमी): रात-भर जागरण। प्रातः सूर्योदय से पहले फिर घाट पर पहुंचकर उगते सूर्य को अर्घ्य। उसके बाद ही व्रती पारण (व्रत-पूर्ति) करती है। ३६ घंटे निर्जल व्रत समाप्त।

विशेष परंपराएँ

ठेकुआ: आटे, गुड़ और घी से बनी मिठाई — छठ का सबसे प्रसिद्ध प्रसाद।

सूप / दौरा: बाँस से बनी विशेष टोकरी, जिसमें प्रसाद रखकर ले जाया जाता है।

दीप-दान: पानी में दीपक तैराए जाते हैं।

कोसी भरना: रात्रि में आँगन में मिट्टी के दीप जलाकर "कोसी" का अनुष्ठान।

नंगे पैर: घाट तक नंगे पैर जाने की परंपरा — विनम्रता का प्रतीक।

स्वच्छता: छठ-काल में अद्भुत स्वच्छता — घर, घाट, सम्पूर्ण नगर। यह पर्यावरण-संरक्षण का सहज पाठ है।

गीत

केलवा के पात पर ऊगेलन

भोजपुरी का प्रसिद्ध छठ गीत
केलवा के पात पर ऊगेलन YouTube पर सुनने के लिए क्लिक करें
सुनें
केलवा के पात पर उगेलन सूरजदेव ।
झुक-झुक कइसन उगेले हो ॥
दउरा-सूप ले गइले छठी मैया ।
अरग दे आइले अरग ले आइले ॥
कांच ही बांस के बहंगिया ।
बहंगी लचकत जाए हो ॥
हे छठी मैया, हम तोहर असरा ।
तोहरे पुजार करत हो ॥
इस लोकप्रिय छठ गीत में केले के पत्तों के बीच से सूर्य देव के उगने का सुंदर वर्णन है — जैसे वे झुक-झुक कर निकल रहे हों। व्रत-धारिनी डलिया-सूप लेकर सूर्य देव को अर्घ्य देने जाती है। बांस की डलिया (बहंगी) में प्रसाद रखकर "बहंगी लचकत जाए" — झूलती-झूलती। छठी मैया से प्रार्थना है कि "हम आपके आसरे हैं — हमारी पूजा स्वीकार करें।" यह गीत हर छठ-घाट पर सुनाई देता है — शारदा सिन्हा द्वारा गाया गया रूप विश्व-प्रसिद्ध है।

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छठ का संदेश

छठ पूजा प्रकृति, सूर्य, जल, और स्वच्छता की उपासना है। यह बताती है कि हमारा जीवन सूर्य पर निर्भर है — सूर्य के बिना अन्न, फल, और जीवन कुछ भी संभव नहीं। साथ ही यह व्रत आत्म-संयम, धैर्य, और कृतज्ञता का सर्वोच्च उदाहरण है।

यह एकमात्र हिंदू पर्व है जिसमें "उगते" और "डूबते" — दोनों सूर्य की उपासना होती है। यह दार्शनिक रूप से बहुत गहरा संदेश है — हम केवल सफलता-काल (उगते सूर्य) में ही नहीं, बल्कि असफलता-काल (डूबते सूर्य) में भी जीवन की कृतज्ञता प्रकट करें।

छठ में जाति-धर्म-वर्ग का कोई भेदभाव नहीं — सब घाटों पर साथ खड़े होते हैं। यह सामाजिक एकता का अद्भुत त्योहार है।

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